सोनार तथा रडार क्या है

Q. . सोनार क्या है? भारत द्वारा विकसित प्रमुख सोनार प्रणालियों पर चर्चा कीजिये।
सोनार (Sound Navigation And Ranging) ध्वनि तरंगों का प्रयोग कर किसी वस्तु अथवा पदार्थ की दूरी (परास), उँचाई, दिशा, चाल आदि का दूर से ही पता लगाने वाली प्रणाली।इसमे ध्वनि तरंगो की प्रकृति अपश्रव्य (Infrasonic)तथा पराश्रव्य (Ultrasonic)दोनों का प्रयोग किया जा सकता है।सोनार का प्रयोग मुख्यतः नौसेना द्वारा समुद्र में विभिन्न जलयानों के विषय में सूचना प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
सोनार प्रणालियाँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं –
1 .सक्रिय (Active)-ऐसी सोनार प्रणालियों में प्रयुक्त Transducer नामक युक्ति जलयानों से उत्सर्जित होने वाले विद्युत संकेतों को ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर देती है, जिन्हें सोनार प्रणालियों द्वारा ग्रहण कर दूरी तथा अन्य विमाओं का परीक्षण किया जाता है।
2 .निष्क्रिय (Passive)-ऐसी सोनार प्रणाली समुद्र में उपस्थित जंतु,पिंड,पदार्थ अथवा जलयानों द्वारा उत्पन्न ध्वनि तरंगों के विश्लेषण पर आधारित होती है।
भारत द्वारा विकसित प्रमुख सोनार प्रणालियाँ निम्नलिखित हैं –
1 .हम्सा या हंस -स्टेट-ऑफ-आर्ट शिप-बोर्न सोनार HUMSA , नौसेना भौतिकी और समुद्रविज्ञान प्रयोगशाला (एनपीओएल), कोच्चि द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बंगलोर द्वारा उत्पादित किया गया है। यह नौसेना जहाजों के लिए एक मानक फिट है। 12 प्रणालियां उत्पादित की गई हैं।
2 .पंचेंद्रिया(Panchendriya)-पनडुब्बियों में प्रयुक्त सोनार प्रणाली। इसे DRDO द्वारा विकसित किया गया है।
3 . मिहिर(Mihir)- हवाई डंकिंग सोनार का तकनीकी मूल्यांकन ट्रायल, मिहिर को सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। सोनार को एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर पर स्थापित करने की अनुमति मिल गई है। जहाज पर अधिष्ठापन के लिए इस सोनार के अलग स्वरूप पर भी भारतीय नौसेना विचार कर रही है।

i) रेडार शब्द अंग्रेजी के शब्द ‘रेडियो डिटेक्सन एंड रेंजिंग’ का संक्षिप्त रूप है। दरअसल, रेडार एक ऐसा सिस्टम है, जो रेडियो तरंगों का उपयोग कर लक्ष्य का पता लगता है। हाल ही में इसरो ने आंध्रप्रदेश के तिरुपति में गडंकी आयोनोस्फेरिक रेडार इंटरफेरोमीटर (Gandanki Ionospheric Radar Interferometer – GIRI) की स्थापना की है। इससे अब आयनमंडलीय विसंगतियों का पता लगाना संभव हो सकेगा।
तुमने चमगादढ़ अवश्य देखे होंगे। रेडार की तकनीक ठीक चमगादडों पर आधारित है। चमगादड़ अंधेरे में भी बिना किसी वस्तु से टकराये उड़ने के लिए रेडियो तरंग या विद्युत चुंबकीये तरंगों का प्रयोग करते हैं। वे उड़ते हुए पराध्वनिक तरंगें (इसे इंसान नहीं सुन सकते) प्रसारित करते रहते हैं और दूसरी वस्तुओं से टकरा कर वापस लौटती आवाज (ध्वनि तरंगों) की मदद से चीजों का पता लगा लेते हैं। रेडार का विकास चमगादडों के साथ किये प्रयोग के आधार पर किया गया। यह दरसाता है की रेडियो तरंगों या विद्युत चुम्बकीय तरंगों की ध्वनि और प्रतिध्वनि चीजों का पता लगाने में सहायक होती। रेडार का आविष्कार अमेरिका के साइंटिस्ट टेलर व लियो यंग ने वर्ष 1922 में किया था। यह यंत्र आने-जानेवाले वायुयानों की सूचना और उनकी स्थिति ज्ञात करने के काम आता है।

कैसे काम करता है रेडार

रेडार एक प्रकार से रेडियो स्टेशन की तरह काम करता है। इसमें एक ट्रांसमीटर और एक रिसीवर लगा होता है। यह रेडार के एरियल से संबन्धित होता है। रेडार के ट्रांसमीटर से रेडियो तरंगें निकलती है। इसका ट्रांसमीटर निश्चित समयान्तराल में रेडियो तरंगों को छोटे-छोटे कंपन के रूप में हवा में छोड़ता रहता है। यह एक सेकेंड के दसवें हिस्से के समय तक तरंगें संचारित करता रहता है, जो अपने लक्ष्य से टकरा कर वापस आती है। रेडार का रिसीवर रेडियो तरंगों के वापस लौटने का समय नोट कर लेता है। इसका रिसीवर टीवी की तरह काम करता ह
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