कुंभलगढ़ का युद्ध 1578

🌷 हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा प्रताप ने कुंभलगढ़ को अपना केंद्र राजस्थानी बना कर मुगल स्थानों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया इससे क्रोध होकर अकबर ने

🌷 शाहबाज खा द्वारा कुंभलगढ़ जितना➖ 1577 में शाहबाज खा के नेतृत्व में एक सेना मेवाड़ की ओर भेजी शाहबाज खॉ ने 1578 इसी में कुंभलगढ़ पर आक्रमण कियालंबे समय तक उसने कुंभलगढ़ पर आक्रमण जारी रखा रसद की कमी होने पर प्रताप किले का भार मानसिंह सोनगरा को सौंप कर पहाड़ों की ओर निकल गया अंत में भीषण संघर्ष के बाद

🌷 कुंभलगढ़ विजय➖ 3 अप्रैल 1578 को शाहबाज खॉ ने कुंभलगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया इस प्रकार पहली बार यह अजेय किला किसी आक्रमणकारी द्वारा जीता गया यह एकमात्र अवसर था जब कुंभलगढ़ 2 वर्ष के लिए मेवाड़ के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहा

🌷 कुंभलगढ़ का पुनर्निर्माण में शामिल होना➖ राणा प्रताप ने 1580में पुनः कुंभलगढ़ जीत कर उसे अपनी राजधानी बनाया था राणा ने प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कुंभलगढ़ को अपनी नई राजधानी बनाया जबकि इससे पूर्व आवर गढ़ को प्रताप ने अपनी अस्थाई चौकी बनाया था

🌷 मेवाड़ का भामाशाह➖इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप इधर से उधर सुरक्षा की खोज में भाग गए थ तथा वह मेवाड़ की सीमा पार कर ईडर चले गये तथा उनके पास धन का भी अभाव होने लगा इसी स्थान पर इसी समय 1580 में चूलिया ग्राम में राणा को उसका मंत्री भामाशाह मिला और भामाशाह ने अपनी निजी संपत्ति से राणा की 20 हजार स्वर्ण मुद्राओं से आर्थिक सहायता की जिससे राणा ने 25000 सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह किया इसीलिए भामाशाह को दानवीर और मेवाड़ का उद्धारक कहा जाता है भामाशाह पाली निवासी था इसमें संकट के समय राणा प्रताप की आर्थिक सहायता करें इस कारण जेम्स टॉड ने भामाशाह को मेवाड़ का कर्ण कहा इसे मेवाड़ का रक्षकभी करते हैं भामा शाह का संबंध ओसवाल की कावड़िया शाखा से था इसका जन्म 28 जून 1547को रणथंबोर ओसवाल परिवार में भारमल के यहां हुआ था महाराणा प्रताप ने महासहानी रामा के स्थान पर भामाशाह को अपना प्रधान बनाया कर्नल जेम्स टोड ने कुंभलगढ़ दुर्ग के लिए हुए इस युद्ध को सार्वभौमिक स्थल का युद्ध कहां है

🌷 अकबर द्वारा प्रताप को पकड़ने के लिए अब्दुल रहीम खानखाना को भेजना➖1580 में अकबर ने शाहबाज खा को वापस बुला लिया तथा अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप के विरुद्ध भेजा अब्दुल रहीम खानखानाने शेर पुर को आधार बनाकर वहां अपना परिवार छोड़ दिया और प्रताप के विरुद्ध संघर्ष की तैयारी प्रारंभ की राणा प्रताप के पुत्र कुंवर अमरसिंहने शेरपुर पर आक्रमण कर खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया राणा प्रताप को जब इसकी जानकारी मिली तो वह बहुत नाराज हुए और खानखाना के परिवार को सम्मान वापस छुड़ाने का आदेश दिया खानखाना प्रताप के इस व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित हुआ और उसने प्रताप के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं करी

🌷 अकबर द्वारा सैनिक चौकियों की स्थापना करना 1580के बाद अकबर ने प्रताप के विरुद्ध आक्रमक नीति का परित्याग कर दिया तथा सीमा पर मुगल साम्राज्य की सुरक्षा के लिए वह मेवाड़ पर नियंत्रण रखने के लिए चार सैनिक छावनियों की स्थापना की दिवेर➖अजमेर देबारी➖उदयपुर देसूरी➖पाली व देवल➖डूंगरपुर जिसमें दिवेर सबसे महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह मेवाड़ को अजमेर से जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित थी इस समय दिवेर थाने का प्रभारी सम्राट अकबर का काका सुल्तान खाँ था

🌷 पर्वतीय प्रदेश में कुंभलगढ़ मेवाड़ का मेरूदंड था 📚🔷📚🔷📚🔷📚🔷📚

💠💠💠💠💠💠 💠💠 🌻🌿दिवेर का युद्ध अक्टूबर 1582🌿🌻

🌷 इस युद्ध स ेही महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की भूमि को मुक्त कराने का अभियान दिवेर से प्रारंभकिया यह युद्ध महाराणा प्रताप अमर सिह भामाशाह और अकबर का सेनापति सुल्तान खाँ के बीच हुआ था इस युद्ध में महाराणा प्रताप विजय हुआ था इस युद्ध में सुल्तान खॉ अमर सिंह के हाथों मारा गया था अब्दुल रहीम खानखाना के अभियान के बाद महाराणा प्रताप अपने आक्रामक नीति का पालन किया तथा 1582 में दिवेर पर आक्रमण कर दिवेर पर अधिकार कर लिया इसके बाद मेवाड़ की मुक्ति का एक लंबा संघर्ष प्रारंभ हुआ इसीलिए कर्नल टोड ने दिवेर के युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहां दिवेर के शाही थाने का मुख्तार बादशाह अकबर का चाचा सेरिमा सुल्तान खान था महाराणा प्रताप ने उस पर अक्टूबर 1582 में आक्रमण किया मेवाड़ और मुगल सैनिकों के मध्य निर्णायक युद्ध हुआ महाराणा प्रताप को यश और विजय प्राप्त हुई दिवेर की जीत की ख्याति चारों ओर फैल गई कर्नल टॉड ने इस युद्ध को प्रताप के गौरव का प्रतीक माना और मैराथन की इस संज्ञा दीइस युद्ध का वर्णन रणछोड़ भट्ट द्वारा रचित राज प्रशस्ति और अमर काव्य्म में किया गया है दिवेर की जीत के बाद महाराणा प्रताप ने

🌷 चावंड➖चावंड में अपना निवास स्थान बनाया प्रताप ने लूणा चावंडिया को परास्त कर 1585 में चावंड को अपनी राजधानी बनाया अगले 28 वर्षों तक चावंड मेवाड़ की राजधानी रहा चावंड में राणाप्रताप ने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया इसके बाद महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर शेष संपूर्ण मेवाड़ पर अपना अधिकार कर लिया था मानसिह और जगन्नाथ कछवाहा के आक्रमणों का बदला लेने के लिए प्रताप ने आमेर के क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा अामेर राज्य के संपन्न कस्बे मालपुरा को लूटा था

🌷 मृत्युपावँमें किसी और असावधानी से कमान से लग जाने से वह स्वस्थ हो गए और 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष 9 महीन 56 वर्ष की आयु में चावण्ड मे प्रताप इस दुनिया से विदा हो गए

🌷 बाडौली➖चावण्ड से डेढ़ मील दूर बांडोली गांव में प्रताप का दाह संस्कार किया गया स्मृति में एक स्मारक बनाया गया है जो आज भी यहां है राणा प्रताप ने उदयपुर जिले के बदराणा में हरिहर मंदिर का निर्माण कराया

🌷 प्रताप को अन्तिम बार हराने का अकबर का प्रयास➖ अकबर ने प्रताप को पराजित करने के लिए फंदा तो 1584-85 में जगन्नाथ कछवाह के नेतृत्व में भेजा था जो असफल रहा जगन्नाथ कछवाह की मृत्यु मांडल भीलवाड़ा मे हुई जहॉ 32 खंभों की छतरी बनी हुथी

🌷 दरबारी कवि➖माला सांदू और पंडित चक्रपाणी मिश्र राणा प्रताप के दरबारी कवि थे चक्रपानी मिश्र द्वारा लिखे गए ग्रंथ मुहूर्त माला विश्व बल्लभ राज्यभिषेक पद्धति माला सांदूने महाराणा प्रताप का झूलनाग्रंलिखा

🌷 बलीचा गांव➖ गांव में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का स्मारक बनाया है जो छतरी के नाम से जाना जाता है इस जगह पर महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की मृत्यु हुई थी चेतक की एक टांग कट गई थी फिर भी वह 26 मील दौड़ कर उसने प्रताप की जाबचाई

🌷 कन्हैयालाल सेठिया➖ उन्होंने पीतल और पाथल कृति की रचना की यहां पर पाथल से तात्पर्य महाराणा प्रताप से है इस रचना में उन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात्महाराणा प्रताप की स्थिति का वर्णन किया है कन्हैया लाल सेठिया का जन्म राजस्थान के चूरु जिले के सुजानगढ़ शहर में हुआ है इंहें राजस्थानी भाषा के भीष्म पितामह कहते है

🌷 विश्व वल्लभ ग्रंथ➖ चक्रपाणि मिश्र द्वारा विश्व बल्लभ ग्रंथ की रचना की गई इस ग्रंथ में भूमि जल स्त्रोतों की खोज मिट्टियों का परीक्षण वृक्षों की बुआई रोपण की विधियां रितुओं के अनुसार सिंचाई का ज्ञान कीटाणुओं का उपचार आदि का वर्णन मिलता है

🌷 गोरा बादल पद्मिनी चरित्र चौपाई➖ इस ग्रंथ की रचना मुनि हैम रतन द्वारा भामाशाह के अनुज ताराचंद जो कि गोडवाड प्रदेश का प्रशासक था के निवेदन पर की गई

🌷 महाराणा प्रताप का झूलना➖ इस ग्रंथ की रचना प्रसिद्ध चारण कवि माला सांदू ने करी है इस ग्रंथ में बप्पा रावल से लेकर राणा प्रताप तक का मेवाड़ का इतिहास है रामा सांदू और माला सांदू प्रसिद्ध चारण कवि थे जो सैनिकों में त्याग और बलिदान की भावना को जागृत करने के लिए प्रसिद्ध है

🌷➖राणा प्रताप को अकबर के विरुद्ध अपने अभियान में सिरोही के सुल्तान देवड़ा इडर के नारायणदास मारवाड़ के राव चंद्रसेन का अप्रत्यक्ष सहयोगथा

🌷➖पूंजा भील द्वारा प्रताप का युद्ध मे साथ देना व चित्तौड़ की रक्षा के लिए भीलों का आद्वितीययोगदान देने के कारण ही मेवाड राज्य के राज चिह्न में भील युवक के अंकन को स्वीकार किया गया

⚔अकबर द्वारा राणा प्रताप के विरुद्ध भेजे गए अभियान⚔

1⃣मानसिंह➖1576
2⃣अकबर➖1576
3⃣शाहबाज खॉ➖ 1577
4⃣शाहबाज खाँ➖1578
5⃣शाहबाज खाँ➖1579
6⃣अब्दुर्रहीम खानखाना➖1580
7⃣जगन्नाथ कछवाह➖1584-85.
💠🌻💠🌻💠🌻💠🌻💠