महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

🌷महाराणा प्रताप का जन्म➖ 9 मई 1540 वीर विनोद के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 15 मई 1539 इसी को नैंसी के अनुसार 4 मई 1540 इसी को कर्नल टॉड के अनुसार 9 मई 1549 इसी को कुंभलगढ़ में हुआ

🌷जन्म स्थान➖कुंभलगढ़ के कटारगढ के बादल महल जुनी कचहरी में ,( राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित ग्रंथ महाराणा प्रताप में विभिन्न तर्कों के उपरांत महाराणा प्रताप का जन्म अपने मामा के यहां पाली में होना माना गया है) प्रताप का बचपन का जीवन कुंभलगढ़ में ही गुजरा था

🌷राज्यभिषेक➖28 फरवरी 1572 गोगुंदा में महाराणा प्रताप का राज्यभिषेक कृष्णदास में प्रताप की कमर में राजकीय तलवार बांधकर किया गोगुंदा के राज्य अभिषेक को राजमहलों की क्रांति भी कहा गया ,

🌷द्वितीय राज्यभिषेक➖राणा प्रताप का दूसरा राज्यभिषेक कुंभलगढ़ किले में विधिवत तरीके से हुआ था जिस में मारवाड़ चंद्र सेन ने भी भाग लिया था (नोट➖अगर परीक्षा में गोगुंदा और कुंभलगढ़ दोनों ऑप्शन आते हैं तो गोगुंदा इज राइट आंसर),

🌷प्रताप के पिता➖उदय सिंह ,

🌷प्रताप की माता➖जयवंता बाई जो (अखेराज सोनगरा की बेटी थी),

🌷प्रताप की पत्नी➖अजब्दे पंवार (अमर सिंह की माता)

🌷प्रताप का घोड़ा➖चेतक,

🌷चेतक की छतरी➖बलीचा/बालेचा (उदयपुर)

🌷प्रताप के उपनाम➖राणा कीका, नलिया कति, पाथल, गजकेसरी, नीला घोड़ा रा असवार, मेवाड़ केसरी

🌷प्रताप द्वारा लड़े गए युद्ध➖ हल्दीघाटी का युद्ध 1576, कुंभलगढ़ का युद्ध 1578, दिवेर का युद्ध 1582, दिवेर के युद्ध से ही मेवाड़ की भूमि को मुक्त कराने का अभियान प्रारंभ किया गया दिवेर की जीत के बाद ही महाराणा प्रताप चावंड में अपना निवास बनाया और 1585 ई.में चावंड को अपनी राजधानी बनाई

🌷महाराणा प्रताप की मृत्यु➖19 जनवरी 1597 चावंड मे नोट➖( जेम्स टॉड के अनुसार महाराणा प्रताप की मृत्यु उदयपुर में पिछोला झील के पास के महलों में हुई थी).

🌷महाराणा प्रताप की छतरी➖बांडोली उदयपुर बांडोली में स्थित प्रताप की छतरी पर 8 खंबे हैं

🌹महाराणा प्रताप के उपनाम🌹

🌻 राणा कीका➖महाराणा प्रताप को पहाड़ी क्षेत्रों में भीलो द्वारा राणा कीका कहा जाता था जो छोटे बच्चों का संबोधन सूचक शब्द है मुस्लिम इतिहासकार भी महाराणा प्रताप को कीका नाम से संबोधित करते थे

🌻 नलिया कति➖ अकबर महाराणा प्रताप को अपनी अभिनता में नहीं ला पाया था इसलिए अब्दुल फजल ने महाराणा प्रताप को नलिया कति कहा

🌻 गजकेसरी➖ जेम्स टोड ने महाराणा प्रताप को गज केसरी के नाम से संबोधित किया है

🌻 पाथल➖ राजस्थानी साहित्य में राणा प्रताप को पाथल और बीकानेर के कवि पृथ्वीराज राठौर को पीतल कहा गया यहां पर पाथल का अर्थ सूर्य है

🌻 नीला घोड़ा रा असवार➖ शक्ति द्वारा प्रताप को बचाने के लिए अपना नीला घोड़ा दिया और प्रताप को बचाया इस कारण प्रताप को नीला घोडा रा असवार कहां

🌷 मेवाड़ केसरी➖महाराणा प्रताप को मेवाड़ केसरी के नाम से भी जाना जाता था

🐎⚜महाराणा प्रताप द्वारा लड़े गए युद्ध/महाराणा प्रताप के समय के युद्ध⚜🐎

🌷हल्दीघाटी का युद्ध इस युद्ध को राजसमन्द युद्ध,

🌷बदायूंनी ने हल्दीघाटी के युद्ध को अपने ग्रंथ मुंतखब उल तवारीख में गोगुंदा का युद्ध कहा और

🌷अबुल फजल ने इसे खमनोर का युद्ध कहा

🌷 राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर स्थित खमनोर स्थान पर हल्दीघाटी के दर्रे के बाहर से यह युद्ध हुआ इस स्थान विशेष के कारण इस युद्ध को खमनौर के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है राणा रासो,संगतरासो,राज प्रशस्ति शिलालेख,अमर काव्य में इस युद्ध को खमनोर का युद्ध बताया गया है

🌷 कर्नल जेम्स टोड ने इसे मेवाड़ की थर्मोपोली और इस युद्ध के प्रत्येक नगर के लड़ाकों को लियोनीडास कहा हैया राजस्थान की थर्मोपोली कहां गया,

🌷कर्नल जेम्स टोड ने ही अपनी पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्यूटीज ऑफ राजस्थान में पहली बार इस युद्ध को हल्दीघाटी का युद्ध नाम दिया,

🌷इसके अतिरिक्त इस युद्ध को प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा ने इसे अनिर्णित युद्ध की संज्ञा दी है,

🌷बनास नदी के निकट या युद्ध होने के कारण इस युद्ध को बनास युद्धभी कहा गया

🌷इस युद्ध को हाथियों का युद्धभी कहां गया क्योंकि इसमें सिसोदिया वंश वह मुग़ल वंश के हाथियों ने प्रमुखता से भाग लिया

🐘 प्रसिद्ध हाथी➖जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में योगदान दिया

🐘 मर्दाना हाथी➖ हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह के हाथी का नाम था इसके अतिरिक्त गजमुक्ता और गजराज नामक चर्चित हाथी भी मानसिह की सेना में शामिल थे

🐘 हवाई हाथी➖ हल्दीघाटी युद्ध में अकबर के हाथी का नाम था

🐘 राम प्रसाद➖महाराणा प्रताप का सबसे अधिक प्रसिद्ध हाथी युद्ध के दौरान यह हाथी मुगल सेना के हाथ लग गया था अकबर ने हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात राम प्रसाद का नाम बदलकर पीर प्रसाद कर दिया महाराणा प्रताप का सर्वाधिक विश्वसनीय और अत्यधिक प्रसिद्ध हाथी था हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात अमीरों द्वारा बदायूंनी को युद्ध के समाचार व विवरण सहित बादशाह के पास भेजा गया था तथा राणा प्रताप का प्रसिद्ध हाथी रामप्रसाद भी उपहार के रूप में बादशाह को भेजा गया था यह एक ऐसा युद्ध था इसमें ना तो तीर न हीं गोलियां चली और नहीं तोपखाना गरजा केवल कवचधारी एवं अपनी सुन्डो में जहरीले खंजर लिए हुए तथा पूछो में धारदार तलवारे लिए हुए लूणा और रामप्रसाद शत्रु की सेना को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे, हल्दीघाटी के युद्ध की रणनीति अजमेर के मेग्जीन फोर्ट या अकबर के किले में बनाई गई थी

🌷 युद्ध की तिथि यह युद्ध इतिहासकार ए एल श्रीवास्तव के अनुसार 18 जून 1576 को और गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून 1576 को लड़ा गया लेकिन इसकी प्रमाणित तिथि 18 जून 1576 ही मानी गई है गोगुंदा व खमनौर की पहाड़ियों के मध्य मिट्टी का रंग पीला होने के कारण इसे हल्दीघाटी का युद्ध कहा गया यह युद्ध मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप अकबर के सेनानायक मानसिह के मध्य हुआ

🌷 हकीम खां सूरी इस युद्ध में राणा प्रताप की सेना में हरावल पक्ष का यानी अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व हकीम खां सूर/सूरीने किया था जो प्रताप की सेना के मुख्य सेनापति थे हकीम खां सूर प्रताप की सेना में लड़ने वाले एकमात्र मुसलमान थे इनका मकबरा खमनोर राजसमंदमें बना हुआ है

🌷 मानसिंह का सैनिक अधिकारी हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना हार रही थी लेकिन मुगल सेना के नेता मिहत्तर खान ने अकबर की आने की झूठी अफवाह फैला दी जिससे मुगलों के सैनिकों में जोश आ गया

🌷 बदायूनी युद्ध में एकमात्र इतिहासकार जो कि अकबर की तरफ से था वह बदायूनीथा जिस ने हल्दीघाटी के युद्ध का आंखों देखा हाल लिखा

🌷*अकबर का जनरल* इस युद्ध में मानसिह की ओर से लड़ने वाले आसफ खॉ ने हल्दीघाटी के युद्ध को जिहाद (धर्म युद्ध)कहा था

🌷 प्रताप के नायकइस युद्ध में प्रताप की सेना में ताराचंद,भामाशाह, रामसिह,पुंजा भील झाला मानसिह/मन्ना/बीदा जैसे सेनापतियो ने भाग लिया,

🌷 पूंजा भीलपूजां भील के नेतृत्व में भीलों ने प्रताप कीओऱ से भालिया

🌷 राव बीदा/ झाला मानसिंह/मन्नाप्रताप को संकट में देखते हुए, प्रताप के युद्ध से हटने से पूर्व सादडी के झाला बीदा ने प्रताप के सिर से राजकीय छत्र खींचकर स्वयं धारण कर मानसिह के सैनिकों से अंतिम दम तक लड़ा शत्रुओं ने बिदा को प्रताप समझकर मार डाला

🌷 मानसिंह सोनगरा यह महाराणा प्रताप का मामा और पाली का शासक था इसी के प्रभाव के कारण जगमाल के स्थान पर महाराणा प्रताप का राज्यभिषेक हुआ हल्दीघाटी के युद्ध में यह वीरगति को प्राप्त हुआ

🌷 शाहबाज खाँ महाराणा प्रताप के समय अकबर ने इनको तीन बार मेवाड़ पर आक्रमण के लिए भेजा

🌷 शक्ति सिह इनका जन्म महाराणा उदयसिंह की सोलंकी रानी सजना बाई से हुआ यह महाराणा प्रताप का अनुज था महाराणा उदयसिंह से नाराज होकर शक्ति सिह चित्तौड़ का परित्याग कर अकबर की सेवा मैं धोलपुर गया परंतु वह वहां उपस्थित नहीं रहा हल्दीघाटी के युद्ध मेंशक्ति सिंह ने प्रताप का सहयोग किया और उनकी रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई शक्ति ca के वंशज शक्तावत कहलाए इस युद्ध में दोनों भाइयों का मिलन बलीचा गांव के समीप हुआ इसी स्थान पर चेतक की मृत्यु हुई इसी शक्ति ने अपना नीला घोडा प्रताप को देकर प्रताप कि जान बचाई शक्ति कुमार ने युद्ध की पहली खबर दी थी यह शक्ति कुमार अपने पिता केजीवित समय में ही अकबर की शरण में चला गया

🌷 प्रताप की अस्थाई राजधानी राणा प्रताप हल्दीघाटी के मैदान से कुछ ही समय बाद निकलकर गोगुंदा उदयपुर चले गए थे राणा प्रताप गोगुंदा से कोल्यारी चले गए जहां उन्होंने अपनी सेना का इलाज कराया कोल्यारी गांव के निकट ही कमलनाथ पर्वत पर स्थित आवर गढ़ में प्रताप ने अपनी स्थाई राजधानी स्थापित की मानसिंह ने हल्दीघाटी के युद्ध के बाद गोगुंदा पर अधिकार कर लिया था परंतु मुगल फौज के लौट जाने पर कुछ समय बाद प्रताप ने गोगुंदा पर अधिकार कर लिया गोगुंदा के निकट मजेरा गांव के पास रणेराव के तालाब पर राणा ने अपनी सैनिक छावनी स्थापित कि इसके बाद प्रताप ने कुंभलगढ़ को अपना निवास बनाया हल्दीघाटी के युद्ध के 4 माह के बाद स्वयं अकबर ने मेवाड़ पर चढ़ाई की और नवंबर 1576 को उदयपुर जीत लिया नवंबर 1576 में अकबर ने उदयपुर जीतकर उसका नाम मोहम्मदाबाद कर दिया तथा वहां का प्रबंधक जगन्नाथ कछवाहा जो मानसिह के चाचा थे को नियुक्त किया गया अकबर नवंबर के अंत तक मेवाड़ में रहा किंतु महाराणा प्रताप को पूर्णतया पराजित करने में असफल रहा

🌷 युद्ध परिणामहल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की सेना विजई रही लेकिन महाराणा प्रताप को नहीं पकड़ने के कारण मानसिह को दी हुई सात हजारी मनसबदारी को छीन लिया गया और कुछ समय के लिए मानसिह और ऑसफ खॉ को दरबार में आने से रोक दिया

🌷बनास नदी के काँठे वाले मैदान को रक्त ताल कहते हैं हल्दीघाटी के युद्ध मेंपहले मोर्चे में सफल होने परराजपूत सेना इस स्थान पर आकर रुकी थी