रणथंभौर किले का इतिहास

 रणथम्भौर दुर्ग /रन्त:पुर/रणस्तम्भपुर(सवाई माधोपुर)
सवाई माधोपुर से लगभग 10 किमी दूर अरावली श्रृखला की ऊँची निची विसम आकृति वाली 7 पहाडियों के मध्य स्थित रणथम्भौर दुर्ग कि स्थिती इतनी विलक्षण है कि यह दुर्ग इसके अत्यन्त पास जाने पर दिखाई देता है।
अबुल फजल ने इस दुर्ग के लिए लिखा है कि
“यह दुर्ग पहाडी प्रदेश के बीच में है इसी लिए लोग कहते है कि अन्य दुर्ग निरवशन (नंगे) है किन्तु यह बख्तरबंद है।“
रणथम्भौर नाम- रण की घाटी में स्थित नगर अर्थात रण उस पहाड़ी घाटी का नाम है जिसके समिप थम्म नामक पहाड़ी पर यह दुर्ग है।

इतिहासकारो का मत है कि इस दुर्ग का निर्माण 8वी शताब्दी के लगभग अजमेर के चौहान शासकों ने करवाया था।
1192 ई में तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान कि पराजय के पश्चात उसका पुत्र गोविन्दराज गोरी का सामन्त की हैसियत से रणथम्भौर का शासक बना और रणथम्भौर सल्तनतकाल मे कुतुबुद्दीन ऐबक इल्तुतमिश और बलबल आदि सुलतानों के अधिपत्य में रहा बाद में चौहानों ने पुर्न अधिकार कर लिया।
रणथम्भौर दुर्ग पहुचने का मार्ग एक सकरी और तंग सक्रिलाकार घाटी से जाता है।यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है इस लिए रणथम्भौर दुर्ग को एरण दुर्ग की श्रेणी मे रखा जाता है।
रणथम्भौर दुर्ग मे प्रवेस हेतु नोलखा दरवाजा , हाथिपोल , गणेशपोल , सुरजपोल और त्रिपोलिया इस दुर्ग के प्रमुख प्रवेश द्वार है।
रणथम्भौर दुर्ग में हम्मीर महल , रानीमहल , सुपारी महल , बादल महल आदि उल्लेखनिय महल है। इन में सुपारी महल इस दृष्टि से विलक्षण है सुपारी महल में एक ही स्थान पर मन्दिर और गिर्जाघर स्थित है।
जौरां भौरा तथा हम्मिर कि कचहरी आदि भी उल्लेखनिय है

रणथम्भौर दुर्ग मे लाल पत्थरों से निर्मित 32 कम्भों की एक कलात्मक छत्रि है जिसका निर्माण हम्मिर देव चौहन ने अपने पिता जेत्र सिंह के 32 वर्ष के शासन के प्रतिक के रूप में करवाया था।

रणथम्भौर दुर्ग मे स्थित त्रिनेत्र गणेश जी का मन्दिर सम्पूर्ण भारत में प्रसिध्द है। और इन्हे रणकभंवर कहा जाता है देश भर से हजारों वैवाहिक निमन्त्रण पत्र रणकभंवर जी को भेजे जाते है।
रणथम्भौर दुर्ग मे स्थित शिव मन्दिर , लक्ष्मीनारायण मन्दिर भी दर्शनिय है। रणकभंवर में पीर सदरूद्दीन कि दरगाह है। जहा प्रतिवर्ष ऊर्स आयोजित हता है।
रणथम्भौर दुर्ग के शासको मे हम्मीर देव का नाम इतिहास के पन्नों पर सर्वाधिक गौरवमय है और हम्मीर को राजस्थान का महानायक माना जाता है संस्कृत व राजस्थानी में हम्मीर पर अनेक ग्रन्थों की रचना है ।
1301 में अलाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर के दो मन्त्रियों रतीपाल व रणमल को बून्दी का राज्य देने का प्रलोभन दे कर दुर्ग में प्रवेश होने कि सफलता प्राप्त कर ली थी। 1301 में रणथम्भौर दुर्ग में राजस्थान का पहला साखा सम्पन्न हुआ। हम्मीर कि रानी रंगदेवी के नेत्तृव में विरागनाओं ने जोहर किया और हम्मिर के नेत्तृव में केसरीया हुआ।
रणथम्भौर में ही पहला व एकमात्र जल जोहर सम्पन्न हुआ।

अलाउद्दीन खिलजी के बाद कुछ समय तक यह दुर्ग तुगलक वश के अधिन रहा बाद में राणा सांगा ने अधिकार कर लिया और अपनी हाडी रानी कर्मावती और उनके पुत्र विक्रमादित्य और उदयसिंह को प्रदान किया था। सन 1533 में गुजरात के सुलतान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो कर्मावती ने सन्धि कर यह दुर्ग बहादुर शाह को दे दिया था।
बाद में मेवाड ने इस दुर्ग पर पुन: अधिकार कर लिया और बुन्दी के राव सुर्जन हाडा को यहा का किलेदार नियुक्त किया। सन 1569 में सुर्जन हाड़ा ने अकबर से सन्धि कर उसे यह दुर्ग सोप दिया राजपूताना के इतिहास मे यह पहला उदाहरण था जब किसी किलेदार ने बिना युद्ध किये ही अपने स्वार्थ सिद्धी के लिये दुर्ग शत्रु को सोप दिया हो।

अकबर ने रणथम्भौर मे शाहीटकशाला स्थापित की और उसके बाद अन्त: तक मुगलों के अधिन रहा।
दर्शनिय स्थल
1. रनिहाड़ तालाब 2. जोगी महल 3. सुपारी 4. जोरां-भोरां/जवरां- भवरां के महल 5. त्रिनेत्र गणेष 6. 32 कम्भों की छत्तरी 7. रानी महल 8. हम्मीर