राजस्थान के इतिहास कला संस्कृति से संबंधित शब्द

*राजस्थान के इतिहास कला संस्कृति से संबंधित शब्द*
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🏈अरायश➖ राजस्थान में भित्तिचित्रोंको चिरकाल तक संरक्षित एवं जीवंत रखने हेतु आलेखन पद्धतिका उपयोग किया जाता है यह पद्धति अरायश कहलाती है

🏈बेवाड़➖ बस्सीके पारंगत कलाकारों द्वारा निर्मित लकड़ी के बने छोटे-छोटे मंदिर बेवाड़ चलाते हैं

🏈श्रावणधोरा➖ राजस्थान के श्री गंगानगर जिले के अनूपगढ़ कस्बेके पास स्थित है इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि श्रवणने अपने माता पिता को आगे तीर्थपर ले जाने के लिए इस स्थान पर मना कर दिया था

🏈अर्थूना➖ राजस्थान में मंदिरों की नगरी के रूप में विख्यात है 11वी 12वी व 15 वी सदी के जैन मंदिरों के अवशेष यहां मिले थे इन में चावंडा राजा परमार द्वारा विनिर्मित मंडलेश्वर मंदिरप्रमुख है यह महाशिवरात्रि वह होली के मेले के लिए प्रसिद्ध है

🏈नड➖ यह एक घन लोक वाद्य यंत्र है यह बैत व कंगोर वृक्ष की लकड़ी से बना होता है लोग और भांगणियारयह वाद्य यंत्र बजाते हैं करणा भीलयह वाद्य यंत्र बजाने में दक्ष एवं माहिर है करणा भील अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हो चुका है

🏈स्वामी गोपालदास➖ चूरू में जन्मे आर्य समाज एवं वेदों की महानता में विश्वास रखते हैं गोपाल दास ने चूरुक्षेत्र में राजनीतिक चेतना जागृत की बीकानेर के महाराजा गंगासिहने इन्हें लंबी अवधि के लिए कारावास दे दिया था

🏈कनकसुँदर➖ आधुनिक राजस्थान उपन्यास साहित्य के प्रवर्तक शिवचंद भरतियाद्वारा रचित एक उपन्यास है से कनकसुँदर को राजस्थानी भाषा का प्रथम उपन्यास माना जाता है

🏈पस्वी➖ संत रैदासजी की वाणियों को रैदास जी की पस्वी कहा जाता है

🏈पडदायेत➖ राजपूत राजाओं के यहां वे दासियां जो पत्नी के रुप में रखी जाती थी लेकिन इन्हें रानी का दर्जा नहीं दिया जाता था यह खवासन पड़दायेत अथवा रखेल कहलाती हैं

🏈मोकडी➖ करौली में विनिर्मित लाख की चूड़ियां जिन पर कॉच की सजावटकी जाती है मोकडीकहलाती है

🏈थाकना शैली➖ यह एक ढोल बजानेकि शैली है जालौर और पालीक्षेत्रों में पुरुषों द्वारा ढोल नृत्य में सबसे पहले मुखिया द्वारा बजाये जाने वाले ढोल की शैली को थाकना शैली कहते हैं

🏈फतै-फतै➖ जसनाथी संप्रदायके लोगों द्वारा जाट कबीले के नर्तक गुरु के आदेश मिलते ही धूणें में प्रवेश करते समय बोले जाने वाले शब्द

🏈अभिलेख➖ तिथिक्रम वंशावलीऔर तत्कालीन समाज की राजनीतिक धार्मिक आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों का ब्योरा देने वाले उत्कीर्णित लेखों को अभीलेखकहते हैं

🏈प्रशस्ति➖ जिन शिलालेखों में किसी शासक की मात्र यशोगाथा अंकित है उन्हें प्रशस्ति कहते हैं जैसे➖ राज सिंह की प्रशस्ति , महाराणा कुंभा की कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति

🏈पारूथद्रम➖ मेवाड़ में सातवीं शताब्दी में प्रचलित सिक्कोको पारूथद्रमकहते हैं

🏈अजीतोदय➖ भट्ट जगजीवन द्वारा रचित ग्रंथ है इसमें जसवंत सिंह-अजीत सिंहके समय मुगल-मारवाड़ संबंधों का उल्लेख किया गया है

🏈बर्बथ का लेख➖ यहां बयाना को प्राचीन समय में बर्बथकहां गया है इस लेख मे मुगल-राजपूत वैवाहिक संबंधों के साथ-साथ अकबर की रानी मरियम मुज्बानोकी आज्ञा से निर्मित बाग एवं बावड़ीके निर्माण का उल्लेख किया गया है

🏈मुल्की➖ इसमें राज्यों की आय ,परगनो व गांवों की आर्थिक स्थिति युद्ध-अभियान कर्मचारियों का वेतनअादि कार्यों में किए गए खर्च का विवरण मिलता है

🏈मुकाता➖ किसान द्वारा राज्य को अनाज या नगद के रूप में एक मुश्त राजस्वका निर्धारण किया जाता था

🏈भाओली➖ कर निर्धारणप्रणालियों में सबसे प्राचीन पद्धति थी इसमें अनुमान के आधार पर फसल के समय वह फसल तैयार होने के बाद राज्य का हिस्साबांट लिया जाता था इसे गल्ला बख्शी या बटाईभी कहा जाता था

🏈आत्म उत्सर्ग➖ सती प्रथा को यूरोपियन लेखकोंद्वारा आत्म उत्सर्ग कहा गया है

🏈फरमान रूक्के निशान➖ वे पत्र जो शासक शाही वंश के लोगों ,मनसबदारों या विदेशी शासको के नाम भेजता था

🏈कमठाना बही➖ राजकीय प्रसादों और भवनोंपर खर्च की जाने वाली राशि के इंद्राज हेतुकाम आने वाली बही को कमठाना बहीकहते हैं

🍃राज्याभिषेक– राज्यभिषेक राजपद से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण संस्कारथा ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार इस अनुष्ठान का उद्देश्य प्रमोच्च शक्ति प्रदान करना था

🍃राजसूय यज्ञ– सर्वोच्चता के अभिलाषी शासकयह यज्ञ करते थे जो लगभग 1वर्षोंतक चलता था और इसके साथ कई अन्य यज्ञ चलते रहते थे इसका वर्णन शतपथ ब्राह्मणमें है

🍃वाजपेय यज्ञ– वाजपेय का अर्थ शक्ति का पान इसका उद्देश्य शासन को नव योवन प्रदान करना था तथा शासक की शारीरिक और आत्मिक शक्तिको बढ़ाना था

🍃अश्वमेघ यज्ञ–यह यज्ञ और भी वितरित समारोह था इसका उद्देश्य राजा के राज्य का विस्तार करना और राज्य के लोगों को सुख तथा समृद्धिप्राप्त करना था

🍃चरक– चरक का अर्थ भ्रमणशील गुरु होता है इनका काम देश के विभिन्न भागों में घूमना और जनता के ज्ञान को बढ़ाना था यह जहां भी जाते लोग ज्ञान प्राप्ति की आशा में इनको घेर लेते थे उद्दालक आरूणि इसी प्रकार का चरक था कुषाणकालीन चरक ने चरक संहिता लिखी

🍃ब्रह्मावादिनी– कुछ सुयोग्य और विदुषी स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहा जाता था

🍃लिपिशाला या लेखशाला– लिपिशाला का अर्थ वह विद्यालय होते हैं जहां पर छात्र केवल दिन में पढ़ने आते हैं ऐसे विद्यालयो को लिपिशाला या लेखशाला कहते हैं

🍃माणवक– वे छात्र जो आचार्य से धर्म ग्रंथ पढ़तेथे माणवक कहलाते थे

🍃शतपति– सौ ग्राम वाले क्षेत्र का प्रशासक को शतपति कहा जाता था

🍃रत्नी/रत्निन– मंत्री परिषद के सदस्य या राज्य अधिकारियों को रत्निन कहा जाता था शतपथ ब्राह्मण में इनकी संख्या 11बताई गई है

🍃स्थितप्रज्ञ–ऐसा व्यक्ति जो सुख-दुख लाभ-हानि जय-पराजय आदि प्रत्येक स्थिति में दृढ़ता से कार्यकरता है और प्रत्येक स्थिति में अविचलित रहता है ऐसे व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ कहा जाता है

🍃स्वधर्म– जिस वर्ण का जो स्वाभाविक कर्म है या स्वभाव के अनुसार जो विशेष कर्म निश्चित है वही स्वधर्म है

🍃गीता में योग–गीता में योग का आशय से आत्मा का परमात्मा से मिलन बताया गया है

🍃चतुर्विंशति सगस्त्र संहिता– रामायण के 24000 श्लोको को चतुर्विंशति सहस्त्र संहिता कहा गया है

🍃शतसहस्त्र संहिता– महाभारत में श्लोकों की संख्या 1 लाख है श्लोकों की इस संख्या को ही शतसहस्त्र संहिताकहा गया है

🍃भोजक– किसानों के प्रतिनिधि को भोजककहा जाता था

🍃कहपण– एक तांबे का सिक्का था जिसका वजन 140 ग्रेन था

🍃सार्थवाह– व्यापारी के काफिले के प्रमुख को सार्थवाह कहा जाता था

🍃पांचरात्र– यह वैष्णव धर्म का प्रधान मतहै इसका विकास तीसरी सदीईसा पूर्व में हुआ था पांचरात्र के मुख्य उपासक विष्णुथे परम तत्व,युक्ति,मुक्ति, योग और विषय जैसे 5 पदार्थों के कारण इसे पांचरात्र कहा गया था

🍃पिपहराव– सबसे प्राचीन स्तूप जो आज भी मौजूद है यह नेपाल की सीमा पर है यह संभवत 450 ईसापूर्व में निर्मित हुआ था इसमें बुद्ध के अवशेष रखे हुए हैं भाजा (महाराष्ट्र) का चैत्य भी उत्कृष्ट है

🍃उपसंपदा– संघ परिवेशको बौद्ध धर्म में उपसंपदा कहा गया ह

🍃उपोसथ–कुछ पवित्र दिवस पूर्णिमा अमावस्या अष्टमी पर सारे भिक्षुगण एकत्रित होकर धर्म चर्चाकरते हैं इसे उपोसथ कहागया है

🍃चैत्य ग्रह (बुद्धायतन)– चिता से चैत्य बना है चिता के अवशिष्ट अंश को भूमि गर्भ में रखकर वहां जो स्मारक तैयार किया जाता है उसे चैत्य गृह कहा जाता था

🍃जातक ग्रंथ–सुत्त पिटक के पांचवें भाग खुद्दक निकाय में बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएंसंकलित हैं इन्हें जातक ग्रंथ कहते हैं लक्खण जातक ,बट्टक जातक ,तेल पंत जातक, गोध जातक, मंगल जातक बावेरू जातक आदि प्रसिद्ध हैं

🍃पांचरात्र व्यूह– वासुदेव, लक्ष्मी, संकर्षण,प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के समूह को पांचरात्र व्यूह कहते हैं

🍃रमञ्ज देश– मीन लोग जो हिंदू बना लिए गए निचले बर्मा में बसे हुए थे इनके प्रदेश रमञ्ज देश कहलाता है

🍃रमल– ज्योतिष की प्राचीन विद्या इसका उद्गम अरब मेंहुआ मुगल काल में रमन का विस्तार अधिक हुआ इसमें पासों के आधार पर परफल निकाला जाता हैं

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